COBI Urges Phased Implementation of Wage Hike to Protect Industry and Employment
झज्जर जिले के सभी औद्योगिक इकाइयों का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रमुख औद्योगिक संस्था कॉन्फेडरेशन ऑफ बहादुरगढ़ इंडस्ट्रीज (कोबी) ने कार्यकारिणी सदस्यों की बैठक में न्यूनतम वेतन में हाल ही में की गई वृद्धि को लेकर अपनी गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।
बैठक में कोबी के अध्यक्ष श्री प्रवीण गर्ग, उपाध्यक्ष श्री विपिन बजाज, महासचिव श्री प्रदीप कौल, संयुक्त सचिव श्री सुरेंद्र वशिष्ठ, कोषाध्यक्ष श्री अशोक कुमार मित्तल, माननीय कार्यकारिणी सदस्य सरदार गुरप्रीत सिंह, श्री सुनील गर्ग, श्री नवल गर्ग, श्री रवि चमड़िया, श्री राजेश गर्ग और श्री दीपक शर्मा ने इस विषय पर चर्चा कर झज्जर जिले के सभी उद्योगों की आवाज सरकार तक पहुंचने के लिए हर संभव प्रयास करने का निर्णय लिया।
इस संबंध में आज कोबी के अध्यक्ष श्री प्रवीण गर्ग एवं कार्यकारिणी सदस्य श्री रवि चमड़िया ने झज्जर के माननीय उपायुक्त श्री स्वप्निल रविन्द्र पाटिल (आई ए एस) को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।
इस प्रकार न्यूनतम वेतन में अचानक की गई वृद्धि से केवल उद्योग ही चिंतित नहीं हैं, बल्कि वे कर्मचारी भी प्रभावित और चिंतित हैं जिनका जीवन पूर्ण रूप से इन उद्योगों पर निर्भर है। यदि बढ़ती लागत के कारण उद्योगों का उत्पादन प्रभावित होता है या संचालन में कटौती करनी पड़ती है, तो इसका सीधा असर रोजगार की स्थिरता और आय पर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे उद्योग और श्रमिक—दोनों ही कठिन परिस्थितियों का सामना करने को मजबूर हो जाएंगे।
कोबी ने अपने ज्ञापन में सरकार से आग्रह किया है कि न्यूनतम वेतन वृद्धि को एकमुश्त लागू करने के स्थान पर चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए, ताकि उद्योगों पर अचानक आर्थिक बोझ न पड़े और वे अपनी उत्पादन एवं संचालन प्रणाली को समयानुसार समायोजित कर सकें। ₹4,000 की न्यूनतम वेतन वृद्धि का वास्तविक प्रभाव इससे कहीं अधिक है। जब इसमें पीएफ, ईएसआई तथा अन्य वैधानिक अंशदान जोड़े जाते हैं, तो प्रति कर्मचारी यह अतिरिक्त भार लगभग ₹6,000 से ₹7,000 प्रतिमाह तक पहुंच जाता है। इस प्रकार की अचानक बढ़ी हुई लागत उद्योगों, विशेषकर लघु एवं मध्यम इकाइयों के लिए वहन करना अत्यंत कठिन हो रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में, जहां उद्योग पहले से ही विभिन्न वित्तीय दबावों से जूझ रहे हैं, इस अतिरिक्त बोझ से उनकी कार्यक्षमता और प्रतिस्पर्धात्मकता पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।
साथ ही उन्होंने कहा कि हरियाणा के न्यूनतम वेतन दरों की अन्य राज्यों से तुलनात्मक समीक्षा की जानी चाहिए। वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक औद्योगिक वातावरण में यदि हरियाणा के वेतन दर अन्य राज्यों की तुलना में अत्यधिक अधिक हो जाते हैं, तो प्रदेश के उद्योगों के सामने प्रतिस्पर्धा बनाए रखना कठिन हो जाएगा।
उद्योग पहले ही बढ़ती कच्चे माल की कीमतों, ऊर्जा लागत, परिवहन खर्च और अन्य परिचालन व्ययों के दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में न्यूनतम वेतन में अचानक और अधिक वृद्धि से उत्पादन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जिसे बाजार में उपभोक्ताओं पर स्थानांतरित करना संभव नहीं है। परिणामस्वरूप, उद्योगों को अपने मुनाफे में कटौती करनी पड़ेगी या फिर अन्य राज्यों की ओर उद्योगों का पलायन एक मजबूरी बन सकता है।
उद्योग अपने कर्मचारियों के साथ हैं और उद्योग तथा कर्मचारी एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के बीच संतुलन और आपसी तालमेल ही औद्योगिक विकास की नींव है। सरकार के इस प्रकार के अचानक निर्णय से उद्योगों और उनके कर्मचारियों के बीच का यह तालमेल प्रभावित हो सकता है, जिससे अंततः सभी पक्षों—उद्योग, कर्मचारी और अर्थव्यवस्था—को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
विशेष रूप से सूक्ष्म एवं लघु उद्योग इस निर्णय से सबसे अधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि उनकी वित्तीय क्षमता सीमित होती है और वे अचानक बढ़े हुए खर्चों को वहन करने में सक्षम नहीं होते। इससे रोजगार के अवसरों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
उद्योग हमेशा श्रमिकों के कल्याण और उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के पक्षधर रहे हैं, लेकिन इसके लिए संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिससे उद्योगों की स्थिरता और विकास भी सुनिश्चित हो सके।
कोबी ने झज्जर जिले के सभी उद्योगों की ओर से सरकार से अनुरोध किया है कि वह उद्योगों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस निर्णय पर पुनर्विचार करे और ऐसा समाधान निकाले जो उद्योगों और श्रमिकों—दोनों के हित में संतुलित हो।
आभार
टीम कोबी



